Quit India Movement in Modern History

अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन के असफल होने के लगभग चार महीने बाद ही स्वतंत्रता के लिए भारतीयों का तीसरा जन आन्दोलन आरम्भ हो गया| इसे भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम से जाना गया|
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भारत छोड़ो आन्दोलन

भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement) अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन के असफल होने के लगभग चार महीने बाद ही स्वतंत्रता के लिए भारतीयों का तीसरा जन आन्दोलन आरम्भ हो गया| इसे भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम से जाना गया| 8 अगस्त, 1942 को बम्बई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया| इस प्रस्ताव में यह घोषित किया गया था कि अब भारत में ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति भारत में स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए अत्यंत जरुरी हो गयी है, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र के देश फासीवादी जर्मनी, इटली और जापान से लड़ रहे हैं| यह प्रस्ताव भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति के लिए लाया गया था| इसमें कहा गया कि एक बार स्वतंत्र होने के बाद भारत अपने सभी संसाधनों के साथ फासीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध लड़ रहे देशों की ओर से युद्ध में शामिल हो जायेगा|



इस प्रस्ताव में देश की स्वतंत्रता के लिए अहिंसा पर आधारित जन आन्दोलन की शुरुआत को अनुमोदन प्रदान किया गया|इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद गाँधी जी  ने कहा था कि एक छोटा सा मंत्र है जो मै आपको देता है| इसे आप अपने ह्रदय में अंकित कर लें और अपनी हर सांस में उसे अभिव्यक्त करें| यह मंत्र है-“करो या मरो”| अपने इस प्रयास में हम या तो स्वतंत्रता प्राप्त करेंगें या फिर जान दे देंगे| भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement) के दौरान ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ भारतीय लोगों का नारा बन गया|
9 अगस्त 1942 की सुबह ही कांग्रेस के अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें देश के अलग अलग भागों में जेल में डाल दिया गया साथ ही कांग्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया| देश के प्रत्येक भाग में हड़तालों और प्रदर्शनों का आयोजन किया गया| सरकार द्वारा पूरे देश में गोलीबारी, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां की गयीं| लोगों का गुस्सा भी हिंसक गतिविधियों में बदल गया था| लोगों ने सरकारी संपत्तियों पर हमले किये, रेलवे पटरियों को उखाड़ दिया और डाक व तार व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया| अनेक स्थानों पर पुलिस और जनता के बीच संघर्ष भी हुए| सरकार ने आन्दोलन से सम्बंधित समाचारों के प्रकाशित होने पर रोक लगा दी| अनेक समाचारपत्रों ने इन प्रतिबंधों को मानने की बजाय स्वयं बंद करना ही बेहतर समझा|

1942 के अंत तक लगभग 60,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया और कई हजार मारे गए|मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे| बंगाल के तामलुक में 73 वर्षीय मतंगिनी हाजरा, असम के गोहपुर में 13 वर्षीय कनकलता बरुआ, बिहार के पटना में सात युवा छात्र व सैकड़ों अन्य प्रदर्शन में भाग लेने के दौरान गोली लगने से मारे गए| देश के कई भाग जैसे, उत्तर प्रदेश में बलिया, बंगाल में तामलूक, महाराष्ट्र में सतारा, कर्नाटक में धारवाड़ और उड़ीसा में तलचर व बालासोर, ब्रिटिश शासन से मुक्त हो गए और वहां के लोगों ने स्वयं की सरकार का गठन किया| जय प्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, एस.एम.जोशी.राम मनोहर लोहिया और कई अन्य नेताओं ने लगभग पूरे युद्ध काल के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों का आयोजन किया|




युद्ध के साल लोगों के लिए भयानक संघर्ष के दिन थे| ब्रिटिश सेना और पुलिस के दमन के कारण पैदा गरीबी के अलावा बंगाल में गंभीर अकाल पड़ा जिसमे लगभग तीस लाख लोग मरे गए| सरकार ने भूख से मर रहे लोगों को राहत पहुँचाने में बहुत कम रूचि दिखाई|
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